हजरत उमर (र.आ) 24 लाख मुरब्बाह मील पर हुकुमत करते थै।।
हजरत उमर (रजि.) का इन्साफ बहुत प्रसिद्ध था। वे फरमाते थे कि मेरे दौर में अगर दरिया-ए-फरात के किनारे कोई कुत्ता भी भूख से मर गया तो उसकी सजा उम्रभर भुगतनी होगी।
हजरत उमर (रजि.) का इन्साफ बहुत प्रसिद्ध था। वे फरमाते थे कि मेरे दौर में अगर दरिया-ए-फरात के किनारे कोई कुत्ता भी भूख से मर गया तो उसकी सजा उम्रभर भुगतनी होगी।
एक ऱात जब सारा शेहेर सो पड़ा था तब हजरत उमर निकले। तिन मिल की दुरीया सफर करने के बाद उन्हे एक औरत दिखाई दी। वह कुच पका रही थी।।
पास ही तीन चार बच्चे रो रहे थे। हजरत उमर उस औरत के नजदिक आकर उन्हे पुचा "ये बच्चे क्यो रो रहे है?" उस औरत ने जवाब दिया जनाब ये भुखे है। जल्दि खाना पका कर खिला दिजीये ना। औरत कहती है जनाब कई दिन से खाना नही मिला। "आज भी पकाने के लिये कुच भी नही है।" ईसलिये रो रहे है। हम लोग मदीने के रहने वाले नही है। मदिना ईसलिये आये आमिरुल मुमिनीन हजरत उमर से मदद ले सकु। ये खाली हांडी मे पानी डालकर पका रही हु "ताकि बच्चौ का मन बहला सको." और बच्चा रोना बन्द करके सो जाये।।
हजरत उमर तड़प उटे। उसी वक्त वापस लौटे। वहा जाकर नौकर को बुलाये और कहा खजाना के गडाउन का दरवाजा जल्दी खोलो। नौकर ने देखा हजरत उमर रो रहे थे। उसने तुरन्त खजाने के गडाउन का दरवाजा खोला। हदरत अन्दर गये खजाने से घी,आटा,और खजुर ली। नौकर से बोले "ईन्हे मेरे पीट पर बांध दो।" ऩौकर ने कहा ये आप क्या कर रहे है..? मे लेकर चलता हु आप बताये कहा पहुचाना है..?
हजरत उमर ने जवाब दिया, "कयामत के दीन हशर के मैदान मे तुम मेरे बोझ नही उटाओगे।" ईसलिये आज मेरे ये बोझ मेरे पीट पर बान्द दो। कही कल हशर के मैदान पर आल्लाह मुजे वक्त पर सामान ना पहुचाने के जुर्म मे ना खड़ा करदे।।सब चीजे वह खुद लाद कर ले चले।
हजरत उमर ने जवाब दिया, "कयामत के दीन हशर के मैदान मे तुम मेरे बोझ नही उटाओगे।" ईसलिये आज मेरे ये बोझ मेरे पीट पर बान्द दो। कही कल हशर के मैदान पर आल्लाह मुजे वक्त पर सामान ना पहुचाने के जुर्म मे ना खड़ा करदे।।सब चीजे वह खुद लाद कर ले चले।
और उसी औरत के तम्बु पर पहुंचे।। वह औरत ईन सब चिजौ कर देख कर बहुत खुश हुई। जल्दि जल्दि आटा गुंथा। हांडीं चड़ाई। हजरत उमर चुल्हा फुंकने लगे। खाना तैयार हुआ। बच्चौ ने पेट भर कर खाया। खाकर उचलने कुदने लगे। हजरत उमर ये सब देखकर बहुत खुश हो रहे थे। बच्चौ के मां भी बहुत खुश थी। बार-बार दुआएं दे रही थी। कहती थी, मदिने का खलीफा आपको होना चाहिए। हजरत उमर ईस काबिल नही है।।
रात बहुत गहरी हो चोके थे हजरत ने भी वहा से बिदा लेकर आगये।।
दुसरे दिन वो औरत हजरत उमर के दरबार पर पहुचे। वहा जाकर जब उसने आपने आखौ के सामने हजरत उमर को देखा तब उसकी जहन मे आयी ये वही शख्श है जिसने आदी रात को खाना लाद कर खिलाया था। तो वह हजरत के सामने रो-रो कर माफी मांगने लगे।।
हजरत ने कहा माफि तो मुजे मांगना चाहीये क्योकि आपलोगौ के जरुरत से पेहले मैने समान ना पहुचा पाया। कल हशर के दिन आल्लाह ईस जुर्म के लिये मुजे ना पकड़े। ईसलिये आप मुजे माफ करदिजिये।। ये कहकर हजरत उमर रो पड़े।।
दुसरे दिन वो औरत हजरत उमर के दरबार पर पहुचे। वहा जाकर जब उसने आपने आखौ के सामने हजरत उमर को देखा तब उसकी जहन मे आयी ये वही शख्श है जिसने आदी रात को खाना लाद कर खिलाया था। तो वह हजरत के सामने रो-रो कर माफी मांगने लगे।।
हजरत ने कहा माफि तो मुजे मांगना चाहीये क्योकि आपलोगौ के जरुरत से पेहले मैने समान ना पहुचा पाया। कल हशर के दिन आल्लाह ईस जुर्म के लिये मुजे ना पकड़े। ईसलिये आप मुजे माफ करदिजिये।। ये कहकर हजरत उमर रो पड़े।।
माशा आल्लाह खलीफा हो तो ऐसा।।
पस्ट पड़कर आच्चे लगे तो शैर करदेना।।

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