ईनसाफ की बादशाह हजरत उमर (र.अ) की ईनसाफ की कहानी.
एक बार हजरत उमर (र.अ) ऱात को आपने ईलाके के लोगौ की हल चल जानने के लीये । उम घुम रहे थे। उनके कानौ मे गाने की आवाज आई। बड़ा दर्द बरा गाना था। एक औरत खीड़की पर बैटि हुई गा रही थी।
रात काली है और लम्बी हुती जाती है ऐ आल्लाह मेरी हमदर्द मेरी शौहर मेरी पास नही है।

उसकी शौहर लड़ाई पर गया हुवा था। उनकी याद मे वह गा रही थी। यह गाना सुनकर हजरत उमर (र.अ) बहुत दुखी हु गये थे। और सोचने लगे मे आरब के औरतों पर जुल्म कर रहा हु। कल कयामत के दीन आल्लाह मुजे ईस जुर्म के लिये ना पकड़ ले। आल्लाह के डर से रोने के हालत हो गये थे उनके।
उन्होने तुरन्त हजरत हाफसा के पास आये और उनसे पुछे के एक औरत कीतने दीन तक आपने शौहर के बिना रह सकती है। हजरत हाफसा ने जवाब दिया चार महीना तक रह सकती है। ईसके बाद उसकी दीरज की बान्द टुट जाती है।। ये जवाब सुनकर हजरत उमर (र.अ) ने सुब्हा फज्र के नमाज के बाद हर जगह पर आदेश भेज दिया के कोई भी सैनिक चार महिने से ज्यादा घर से बाहर ना रहे। आगर कोई सैनिक जिनके चार महिने हो गये जो युद्द स्तल पर है वह तुरन्त आपने घर पर आजाये।

माशा आल्लाह यह ईनसाफ थे आमिरुल मुमनीन हजरत उमर (र.अ) की


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एक बार हजरत उमर लागों को खाना खिला रहे थे। देखा कि एक आदमी बाये हाथ से खाना खा रहा है। हजरत उसके पास पहुंचे। बोले, “दाहिने हाथ से खाओ।”
उसने जबाब दिया, “दाहिना हाथ नहीं हैं वह लड़ाई में जाता रहा।”
हजरत का दिल भर आया। आंखों से आंसू बहने लगे।
वहीं उसके पास बैठ गये। बोले, “अफसोस! तुमको वजू कौन कराता होगा? सिर कौन धोता होगा? कपड़े कौन पहनाता होगा?”
बाद में उसके लिए एक नौकर तैनात कर दिया। जरुरी चीजें अपने पास से दे दीये।।
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हजरत उमर के लिए राज करने का मतलब था सेवा करना। वह अपने को मालिक नहीं समझते थे। एक बार एक बड़े आदमी मिलने आये। साथ में और लोग भी थे। आकर देखा वह आस्तीन चढाये इधर-उधर दौड़ते फिरते है। उन्हें देखा तो बोले, “आओ, तुम भी मेरा साथ दो।” आनेवाले ने पूछा, “खैर तो है! क्या हो गया?”
बोले, “खजाने से एक ऊंट भाग गया है। एक ऊंट में कितने गरीबों का हक शामिल है।”
एक आदमी बोल उठा, “अमीरुल मोमनीन, आप क्यों परेशान हो रहे हैं? किसी गुलाम को कहिये, वह ढूंढ लावेगा।”
उन्होंने फौरन कहा, “मुझसे बढ़कर कौन गुलाम हो सकता है!”
वह बड़ी सादगी से रहते थे। जमीन पर सोते थे। खाना बड़ा सादा खाते थे। महीनों गेहूं का आटा घर में नहीं पकता था। छानते तो कभी भी नहीं थे। कपड़े भी सादे होते। अक्सर उनमें पैबन्द लगा रहता। बदन पर फटा हुआ कुरता, सिर पर फटा हुआ अमाया, पैरों में फटी हुई जूतियां। एकबार देर तक घर से नहीं निकले। बाहर लाग राह देख रहे थे। आये तो कारण मालूम हुआ। पहनने को कपड़े न थे, सो बदन के कपड़ों को धोया था। सूख गये तो पहन कर बाहर आये।
कभी कन्धे पर मशक लिये जा रहे है। बेवा औरतों के घर पानी भरना है। कभी मस्जिद के कोने में जमीन पर लेटे हैं। काम करते-करते थक गये हैं। बार-बार बादशाही काम से सफर करते, पर साथ में न खेमा, न शामियाना। न फौज, न फाटा। किसी पेड़ पर कपड़ा डाल दिया जाता। उसी की छॉह में इस्लाम का वह महान खलीफा आराम करता।
एक बार वह सीरिया गये। साथ में बस एक नौकर था। राह में आप उसके ऊंट पर सवार हो गये। शायद गलती से ऐसा हुआ था। जान-बूझ कर भी हो सकता है। जो हो, ऊंट बदल गया। उनका ऊंट कुछ सजा हुआ था। जब शहर में पहुंचे तो लोग स्वागत करने आये। बड़ा मजा आया। लोग नौकर की तरफ जाते। उसी को खलीफा समझते। वह हजरत उमर की तरफ इशारा करता। लोग हैरान-परेशान, आखिर खलीफा कौन से है? बेचारे शान शौकत ढूंढते थे, पर हजरत उमर के पास कहॉँ मिलती!
यह बात नहीं कि वह कंजूस थे। असल में उनको लोगों के सामने मिसाल रखनी थी। खुद ऐश करते तो लोगों से क्या कहते! वह जानते थे कि अफसर बिगड़ते जा रहे है। इसलिए अपने पर कुछ अधिक सख्ती करते थे

दोस्तौ बहुत ही तकलीफ से लिखकर आपलोगौ की खिदमत मे हाजिर करता हु ताकि दीनी ईल्म हर मुसलमान भाई बहन तक पहुच सके।। बस आप लोग खुद भी पड़े और शैर करके दुसरौ को भी पड़ने का मौका दे।।
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आखिर मे एक गुजारिश मेरा नाम आब्दुल्लाह आहमद है 16/12/2017 को मेरा बाईक एक्सिडेन्ट हो गया था।। आज 29/01/2018 मे आबतक बिस्तर पर हु। बिस्तर पर लेट लेटकर आप सबके लिये लिखता हु। आप सबसे गुजारिश है आप सब मेरे लिये दुवा करे ताकि मे जल्दि टीक हो सको।।



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